ट्रंप की नयी शुल्क नीति से भूचाल, सबसे ज्यादा इन क्षेत्रों में महसूस होगा असर

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की ताजा शुल्क नीति ने वैश्विक बाजार में भूचाल ला दिया है। ट्रंप ने पारस्परिक शुल्क (रेसिप्रोकल टैरिफ) की अपनी नीति का ऐलान भारतीय समय के अनुसार दो अप्रैल को देर रात किया। ऐलान के बाद गुरुवार को शेयर बाजार पर इसका व्यापक असर महसूस किया गया।

इसके दबाव में सेंसेक्स ने 800 अंक से ज्यादा के नुकसान में कारोबार की शुरुआत की। हालाँकि बाद में कुछ क्षेत्रों में रैली के दम पर बाजार ने वापसी भी की। फिर भी यह साफ है कि ट्रंप की ताजा व्यापार नीति विभिन्न क्षेत्रों को गहराई तक प्रभावित करने वाली है।

भारत की बात करें तो ट्रंप की नयी शुल्क नीति में 26% की दर तय की गयी है। यह शुल्क भारत के लगभग पूरे निर्यात पर लागू होगा। यह 10% के आधार शुल्क (बेस टैरिफ) के अतिरिक्त है, जो सभी देशों पर एक-समान लागू किये गये हैं। आधार शुल्क 5 अप्रैल से लागू हो रहा है, जबकि पारस्परिक शुल्क को 9 अप्रैल से लागू किया जायेगा। इसके अतिरिक्त वाहन क्षेत्र के लिए 25% शुल्क आज से लागू हो गये हैं।

ट्रंप ने बुधवार को व्हाइट हाउस में नयी शुल्क नीति का ऐलान करते हुए भारत का विशेष जिक्र किया। उन्होंने फिर से दोहराया कि भारत द्वारा अमेरिकी सामानों पर 52% का भारी-भरकम शुल्क लगाया है। इसके जवाब में उन्होंने छूट देते हुए सिर्फ 26% शुल्क लगाया है। भारत के अलावा अन्य प्रमुख देशों को देखें तो पारस्परिक शुल्क की दर चीन के लिए 34%, पाकिस्तान के लिए 29%, बांग्लादेश के लिए 37%, वियतनाम के लिए 46%, यूरोपीय संघ के लिए 20% तय की गयी है। सबसे ज्यादा शुल्क की दर सेंट पिएरे एंड मिकलॉन (Saint Pierre and Miquelon) और लीसोथो के लिए है। इन दोनों देशों के लिए शुल्क की दर 50-50% तय की गयी है।

वाहन क्षेत्र : ट्रंप ने 03 अप्रैल से सभी विदेश निर्मित कारों पर 25% शुल्क लागू करने की घोषणा की है। यह 26% पारस्परिक शुल्क के अतिरिक्त है। यानी भारत से अमेरिका निर्यात होने वाले वाहनों के लिए शुल्क की प्रभावी दर 51% हो गयी है। इससे टाटा मोटर्स जैसी भारतीय वाहन कंपनियों को घाटा हो सकता है। टाटा मोटर्स जगुआर लैंड रोवर (जेएलआर) की मूल कंपनी है और जेएलआर के लिए अमेरिका एक प्रमुख बाजार है। टाटा मोटर्स के निर्यात में अमेरिकी बाजार का करीब 3% योगदान है। राहत की बात है कि अन्य भारतीय वाहन कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार की बिक्री बहुत महत्वपूर्ण नहीं है।

कृषि क्षेत्र : अमेरिकी बाजार भारतीय कृषि उत्पादों के लिए एक बड़ा गंतव्य है। इससे छोटे और मध्यम किसानों की आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हालाँकि इस क्षेत्र में भारत के पास तुलनात्मक लाभ की भी स्थिति बन रही है। चावल के निर्यात में अमेरिकी बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धा वियतनाम और थाईलैंड के साथ होती है। दोनों देशों पर भारत से ज्यादा शुल्क लगा है। चीन पर भी भारत से ज्यादा शुल्क लगा है। ऐसे में भारत के लिए फायदे की भी स्थिति बन सकती है।

ऊर्जा क्षेत्र : शुल्क का ऐलान होने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आयी है। ट्रंप के ऐलान के बाद ब्रेंट क्रूड 3% टूटा। ऐसा माना जा रहा है कि शुल्क के चलते कच्चे तेल की माँग कम हो सकती है। दरअसल शुल्क के चलते व्यापार युद्ध सघन होगा, जो वैश्विक स्तर पर आर्थिक गतिविधियों को सुस्त करेगा और आर्थिक सुस्ती आने पर कच्चे तेल की माँग में गिरावट स्वाभाविक है। भारत के लिए यहाँ भी फायदे की स्थिति बन रही है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है।

सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र : भारत के लिए सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) के क्षेत्र में बड़ी चिंता उभर रही है। भारत का आईटी उद्योग अमेरिकी बाजार पर बहुत अधिक निर्भर है। बढ़ता व्यापार तनाव भारतीय रुपये को कमजोर कर सकता है और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा अमेरिका में महँगाई बढ़ने और मंदी का खतरा तेज होने से भी भारत की आईटी कंपनियों पर असर हो सकता है। यह आज शेयर बाजार में भी दिखा, जहाँ दिन के कारोबार में प्रमुख आईटी शेयरों में 9% तक की गिरावट देखी गयी।

दवा क्षेत्र : भारत का दवा उद्योग भी आईटी की तरह अमेरिकी बाजार पर बहुत ज्यादा निर्भर है। ग्लैंड फार्मा, डॉ रेड्डीज, जायडस जैसी भारतीय दवा कंपनियों को लगभग आधी आय अमेरिकी बाजार से होती है। पहले जेनेरिक दवाओं पर 35% तक शुल्क लगने की आशंका थी, लेकिन ट्रंप ने इस क्षेत्र को छूट दी है। इससे भारतीय दवा कंपनियों को बड़ी राहत मिली है।

विनिर्माण : भारत धीरे-धीरे वैश्विक विनिर्माण में अपनी स्थिति मजबूत बनाने का प्रयास कर रहा है। नयी अमेरिकी शुल्क नीति इस प्रयास पर भारी पड़ सकती है। व्यापार युद्ध तेज होने से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान पैदा होगा। इससे विनिर्माण की लागत बढ़ेगी। यानी भारत में बनने वाले उत्पादों की प्रतिस्पर्धिता प्रभावित होगी। मैक्वेरी का आकलन कहता है कि भारतीय विनिर्माण पर अर्थव्यवस्था के 0.50% के बराबर असर हो सकता है। दूसरी ओर चीन और वियतनाम जैसे देशों पर भारत की तुलना में अधिक शुल्क लगने से फायदे की भी स्थिति बन सकती है। खासकर चीन प्लस वन की रणनीति के तहत विकल्पों की खोज में लगी वैश्विक कंपनियों के लिए भारत विनिर्माण का आकर्षक गंतव्य व स्वाभाविक विकल्प बनकर उभर सकता है।

इनके अलावा भी कई क्षेत्र हैं, जो प्रभावित हो सकते हैं। जैसे वाहनों के कल-पुर्जे बनाने वाले उद्योग, पशुओं के लिए चारा व अन्य उत्पाद बनाने वाले उद्योग, समुद्री भोज्य पदार्थों का निर्यात करने वाला क्षेत्र, रत्न एवं आभूषण क्षेत्र आदि। हालाँकि अभी पूरे असर का आकलन नहीं किया जा सकता है। भारत सरकार की ओर से अभी तक अमेरिका की नयी शुल्क नीति पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है। खबरों में लगातार दावा किया जाता रहा है कि भारत और अमेरिका के बीच नये व्यापार सौदे पर बात चल रही है। ऐसी संभावना जतायी जा रही हैं कि एक बार सौदा तय होने पर भारत के लिए काफी फायदे की स्थिति बन सकती है।

(शेयर मंथन, 04 अप्रैल 2025)

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