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नयी सरकार और बाजार का मधुमास, या मधुवर्ष!

राजीव रंजन झा : इन पंक्तियों को लिखते समय मुझे एक जोखिम उठाना पड़ रहा है। वह जोखिम है एक्जिट पोल यानी मतदान करके लौटते मतदाताओं के सर्वेक्षणों के नतीजों पर भरोसा करने का।

इसमें जोखिम इसलिए है कि 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों के समय एक्जिट पोल मतदाताओं का फैसला पढ़ने में नाकाम रहे थे। लेकिन भरोसा करने का जोखिम उठाने की जरूरत भी है। जरूरत इसलिए है कि 1998 और 1999 में वे काफी हद तक सफल भी रहे थे। इन लोकसभा चुनावों से चंद महीनों पहले पाँच राज्यों में जो विधानसभा चुनाव हुए थे, उनमें भी वे जनता का मिजाज भाँप सके थे। आँकड़े थोड़े ऊपर-नीचे होना अलग बात है, मुख्य बात है जनता के फैसले को ठीक से पढ़ना। अभी ऐसा मानने का कोई स्पष्ट कारण नहीं दिख रहा कि इन लोकसभा चुनावों में मतदान पूरा होने के बाद जो एक्जिट पोल आये हैं, वे वास्तविक जनादेश से काफी अलग होंगे। अलग-अलग खेमों की सीटें थोड़ी कम थोड़ी ज्यादा हो जायें, वह अलग बात है।

बाजार के मौजूदा उत्साह का स्पष्ट कारण यही है कि एक्जिट पोल भाजपा के नेतृत्व में एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिलता दिखा रहे हैं, यानी नये सहयोगियों को तलाशने की जद्दोजहद के बगैर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन सकेंगे। बाजार एनडीए की सरकार और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद को काफी हद तक भुना चुका है। इसलिए नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की स्थिति में भी बाजार में चल रहा मौजूदा उत्साह आने वाले दिनों में कुछ थम सकता है। शायद सेंसेक्स 25,000 के आसपास तक जा कर थम जाये। इसके बाद बाजार को वास्तव में नयी सरकार के कदमों का इंतजार होगा। बाजार यह देखना चाहेगा कि जो उम्मीदें नरेंद्र मोदी से लगायी गयी हैं, वे कितनी पूरी होने वाली हैं।

सबसे पहले तो इसी बात पर नजर रहेगी कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने पर कैसा मंत्रिमंडल बना पाते हैं। उन्हें कौन-कौन नये सहयोगी दल मिलते हैं और उन्हें कैसे मंत्रालय दिये जाते हैं, इन सब बातों से बाजार का उत्साह घटेगा या बढ़ेगा। बाजार को मनमोहन सिंह का वह कथन बखूबी याद रहा है कि गठबंधन की कुछ मजबूरियाँ होती हैं। भाजपा खुद अपने बलबूते बहुमत के जितने करीब होगी, उसे गठबंधन की मजबूरियाँ कम सतायेंगी और वह स्थिति बाजार को उतनी ही अच्छी लगेगी। उस स्थिति में नरेंद्र मोदी आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण मंत्रालयों को अपने दल के हिस्से में रख सकेंगे।

मगर आगे चल कर लोग यह फर्क भी देखना चाहेंगे कि क्या गठबंधन के आगे एक प्रधानमंत्री वाकई इतना मजबूर होता है, जितने मनमोहन सिंह नजर आते थे? या फिर एक मजबूत प्रधानमंत्री स्थिति बदल सकता है? लोग देखना चाहेंगे कि क्या एक मजबूत प्रधानमंत्री सहयोगी दलों को सौंपे गये मंत्रालयों पर भी पूरी दक्षता से नियंत्रण रख सकता है?

नयी सरकार के गठन के तुरंत बाद बजट बनाने की कवायद शुरू होगी। बजट तक की अवधि को नयी सरकार और बाजार का मधुमास माना जा सकता है। रामदेव ने भले ही राजनीति में हनीमून शब्द को गलत संदर्भों में पेश कर दिया, मगर तमाम बाजार विश्लेषक हनीमून अवधि की चर्चा कर रहे हैं, जिस दौरान बाजार नयी सरकार से प्रसन्न बना रहेगा।

हालाँकि मुझे लगता है कि मोदी सरकार और बाजार का मधुमास नहीं, बल्कि मधुवर्ष चलेगा। शुरुआती एक साल तक बाजार उन्हें उम्मीदों को पूरा करने का समय दे सकता है, बशर्ते वे बाजार को एकदम निराश करने वाला कोई बड़ा कदम न उठा लें। इस दौरान उम्मीदें रहेंगी कि मोदी सरकार बुनियादी ढाँचा क्षेत्र को संजीवनी सुंघाने वाले कदम उठायेगी, महंगाई पर नियंत्रण करेगी और उसके चलते रिजर्व बैंक ब्याज दरें घटाने की स्थिति में आ सकेगा।

बुनियादी ढाँचा क्षेत्र में रुकी हुई परियोजनाओं को आगे बढ़ाना उनके लिए सबसे प्रारंभिक और आसान कदम हो सकता है। मगर केवल परियोजनाओं की मंजूरी का मसला सुलटा लेना काफी नहीं होगा। वित्तीय रूप से इस क्षेत्र की ज्यादातर कंपनियों की कमर टूट चुकी है। ये कंपनियाँ बुनियादी रूप से कमजोर, वित्तीय रूप से जर्जर और कर्ज के बोझ से दबी हुई हैं। उन्हें नयी परियोजनाएँ मिलें भी तो उनके लिए जरूरी वित्त जुटा पाना आसान नहीं होगा। अगर कमजोर कंपनियों को पैसे देने के लिए बैंकों पर दबाव डाला गया तो उसके अपने जोखिम हैं।

वहीं तेल-गैस क्षेत्र में उनके लिए दोतरफा चुनौती इंतजार कर रही है। एक तरफ उन्हें तेल सब्सिडी पर लोगों को नाराज किये बगैर ठोस कदम उठाने होंगे, वहीं गैस की कीमतों पर उनके लिए इधर कुआँ उधर खाई वाली हालत होगी। यह राजनीतिक मुद्दा भी बन चुका है और कानूनी मुद्दा भी। हो सकता है कि वे अदालती कार्यवाही को ही इस मुद्दे पर अपनी ढाल बना लें। तेल देखें तेल की धार देखें! Rajeev Ranjan Jha

(शेयर मंथन, 14 मई 2014)

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