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छोटी-मोटी निजी जरूरतों के लिए माइक्रोफाइनेंस कंपनियाें से आसान शर्तों पर ऋण मिल जाता है। मगर पिछले कुछ समय से इन कंपनियों से कर्ज लेने वाले समय से नहीं चुका पा रहे हैं, जिससे डिफॉल्टर की संख्या बढ़ गयी है और एनबीएफसी सेक्टर का एनपीए दिसंबर तक 50,000 करोड़ रुपये पर पहुँच गया है।
क्रेडिट स्कोर ठीक नहीं होने पर बैंक जिन लोन आवेदक को कर्ज देने से इनकार कर देते हैं, एनबीएफसी उन्हें बड़ी आसानी से ऋण दे देती है। इस लिहाज से देखें तो माइक्रो फाइनेंस कंपनियाँ कर्ज लेने का सबसे बड़ा जरिया हैं। लेकिन जानकारी के मुताबिक, दिसंबर तक के आँकड़ों में एनबीएफसी को 50,000 करोड़ रुपये का भारी नुकसान हुआ है।
दिसंबर तक नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स बढ़कर 50,000 करोड़ रुपये हो गया है, जो यह अब तक जारी लोन का 13% है। एनपीए का ये अनुमान क्रेडिट ब्यूरो क्रिफ हाई मार्क के आँकड़ों पर आधारित है। कई ऐसे लोन भी हैं जो अब एनपीए की कगार पर हैं और उनका आँकड़ा बढ़कर 3.2% हो गया है। दरअसल, एक साल पहले यह सिर्फ 1% था, लेकिन अब यह ढाई गुना बढ़ गया है। यह दर्शाता है कि लोग लोन लेकर उसने चुकाने में असमर्थ होते जा रहे हैं।
क्रिफ हाई मार्क पूरा एनपीए आँकड़ा नहीं बताता है लेकिन अलग-अलग तरह के लोन के लिए जोखिम का अनुमान बताता है। इसके मुताबिक, 31 दिसंबर तक 91 से 180 दिनों तक बकाया लोन 3.3% और 180 दिनों से ज्यादा बकाया लोन 9.7% थे।
लोन डिफॉल्ट के मामले बढ़ने की क्या है वजह
दरअसल, कई फिनटेक कंपनियाँ और एनबीएफसी बिना ज्यादा दस्तावेजों के तुरंत लोन दे देती हैं, जिससे लोन लेने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी। वहीं, कोविड महामारी के बाद अब भी कई लोगों को स्थिर आय नहीं मिल रही और इस कारण वे लोन चुका नहीं पा रहे हैं। ऐसे में डिफॉल्ट बढ़ने से एनबीएफसी की बैलेंस शीट पर सीधा असर पड़ा है और अब कई एनबीएफसी नये लोन देने में सतर्क हो गई हैं।
(शेयर मंथन, 28 फरवरी 2025)
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